उत्तराखंड सूचना विभाग की नई विज्ञापन नीति पर उठे सवाल, पोर्टल संचालकों में नाराजगी
देहरादून। राजीव डेरवी।उत्तराखंड में पत्रकारों और छोटे न्यूज़ पोर्टलों को आत्मनिर्भर बनाने के सरकारी दावों के बीच सूचना विभाग की विज्ञापन नीति को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। पोर्टल संचालकों का आरोप है कि इस बार तय की गई विज्ञापन दरें इतनी कम हैं कि उनसे किसी डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म को चलाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि लगभग असंभव हो जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल ₹1,200 की विज्ञापन दर को लेकर है। पोर्टल संचालकों का कहना है कि आज के दौर में वेबसाइट का सर्वर, डोमेन, तकनीकी रखरखाव, कैमरा-मोबाइल, इंटरनेट, रिपोर्टिंग, यात्रा, वीडियो एडिटिंग और पत्रकारों का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में इतनी कम विज्ञापन राशि आखिर किस तरह किसी न्यूज़ पोर्टल को आत्मनिर्भर बनाएगी?
आत्मनिर्भरता या आर्थिक दबाव?
सरकार लगातार स्थानीय पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया को बढ़ावा देने की बात करती रही है। लेकिन पोर्टल संचालकों का सवाल है कि अगर सरकारी विज्ञापन ही बेहद कम दर पर मिलेगा तो छोटे और स्थानीय न्यूज़ पोर्टल अपने खर्च कैसे निकालेंगे?
क्या ₹1,200 की विज्ञापन राशि में एक न्यूज़ पोर्टल की पूरी व्यवस्था चल सकती है?
यही सवाल आज कई डिजिटल मीडिया संचालकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
छोटे पोर्टल सबसे ज्यादा प्रभावित
बड़े मीडिया संस्थानों के पास विज्ञापन के कई स्रोत होते हैं, लेकिन छोटे स्थानीय पोर्टल अक्सर सीमित संसाधनों में काम करते हैं। ऐसे प्लेटफॉर्म स्थानीय खबरों को जगह देते हैं और कम स्टाफ के साथ लगातार ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हैं।
पोर्टल संचालकों का कहना है कि अगर सरकारी विज्ञापन नीति में आर्थिक रूप से व्यवहारिक दरें नहीं होंगी तो इसका सीधा असर स्थानीय पत्रकारिता और रोजगार पर पड़ सकता है।
धामी सरकार से सीधा सवाल
अगर उद्देश्य पत्रकारों और न्यूज़ पोर्टलों को आत्मनिर्भर बनाना है, तो नीति ऐसी क्यों न हो जिससे छोटे डिजिटल मीडिया संस्थान अपने खर्च निकालकर पत्रकारों को रोजगार दे सकें?
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ₹1,200 की प्रस्तावित/बताई जा रही विज्ञापन दर किन गणनाओं और लागत मानकों के आधार पर तय की गई है।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक विज्ञापन का नहीं है।
सवाल उन छोटे पत्रकारों और डिजिटल न्यूज़ पोर्टलों के भविष्य का है, जो सीमित संसाधनों में उत्तराखंड की खबरें जनता तक पहुंचा रहे हैं।
‘आत्मनिर्भर पत्रकारिता’ का सपना कहीं ‘आर्थिक मजबूरी’ में तो नहीं बदल रहा?
सरकार और सूचना विभाग को पोर्टल संचालकों की आपत्तियों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और विज्ञापन दरों की समीक्षा कर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे डिजिटल पत्रकारिता को वास्तविक आर्थिक आधार मिल सके।
**क्योंकि सिर्फ सूचीबद्ध कर देना आत्मनिर्भरता नहीं है—
आत्मनिर्भरता तब होगी, जब पत्रकार और न्यूज़ पोर्टल सम्मानजनक तरीके से अपना संस्थान चला भी सकें।**
